मंगलवार, 26 मई 2015

क्रियात्मकता और सोच

गर्मी की छुट्टियाँ ,मौसम कि मार जिसमें कभी तेज धुप तो कभी अनचाहा बारिश ,बालक मन करे भी तो क्या करे | अब तो आईपीएल भी नहीं क्या किया जाये इसी उधेड़बुन में वह खिड़की के पास आ बैठता है तो कभी बालकनी तो कभी नीचे बच्चों के साथ खेलता है लेकिन किताब के पास जानेसे भी कतराता है | उसे कैसे समझाऊँ जैसे सबके पास जाते हो मन को मनाने इससे भी थोड़ी तो बातें किया करो | ज्यादा बोलो तो आसमान देखते हुए कहता है देखो इस आसमान को देखोगी तो तुम्हारी सोच को अपनी दिशा मिलेगी ज्यादा भीड़-भाड़ में अपनी सोच को सटीक दिशा नहीं मिल पाती है | मैं उस वक्त चुपचाप रहना ही उचित समझी और शाम के समय उस बालमन को कुरेदते हुए कहती हूँ ये तो ठीक है लेकिन कभी-कभी चतुर्दिक परिस्थियाँ भी तुम्हे उचित दिशाओं से अवगत कराती हैं ,इसलिए जहाँ तुम्हेँ जीना है आगे बढ़ना है उससे कभी मत कतराओ अन्यथा उलझनों को सुलझाना कभी नहीं सीख पाओगे |
क्रियात्मकता और सोच को हमेशा प्रायोगिकता के तहत ही रखना सीखो और उसी में खुश रहते हुए उल्लास को ढूंड निकालना सीखना है तो भीड़-भाड़ से कभी मत कतराना | एकांतवास के सोच सरलता से ओतप्रोत होंगे उनके अन्दर एक भय का समावेश होता जायेगा जो कहीं न कहीं से तुम्हे किसी का गुलाम बनने के लिए विवश कर देगा और गुलामी किसी भी तरह कि हो उसकी जकड़न से बचे रहने के लिए प्रत्येक परिस्थियों से अवगत होना अति आवश्यक है | सुदृढ़ता को अपनाओ जिसमें भीड़ को समझाने की क्षमता हो न कि अकेलेपन मात्र शब्दों के तहत खुद को आत्मसंतुष्टि करने की |
सोच कि उत्तमता ऐसी हो जिसमें क्रियात्मकता कि सरलता कठोरता को अंगीकार करते हुए आगे बढेने की ताकत लिए हुए हो |

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